Home katha पूतना पूर्व जन्म में कौन थी ?

पूतना पूर्व जन्म में कौन थी ?

0
33
putna story in hindi
putna story in hindi

श्रीराम दूत : भगवान् श्रीकृष्ण के जन्म के दस दिन के पश्चात् कंस ने वकासुर की बहन पूतना को बालकों का छल-बल के द्वारा वध करते हुए कृष्ण को मारने के लिये जब जानेको कहा, तब पूतना ने कहा कि ‘मैंने स्वप्नमें स्तन स्थल पर घोर पीड़ा होने तथा प्रेतों के द्वारा आलिङ्गित होने आदि का बुरा स्वप्न देखा है, इसलिये हमारा भविष्य घोर भयप्रद प्रतीत होता है। कंसने कहा- ‘भयकी कोई बात नहीं है और फिर बालकों से तो तुम्हें डरने की कोई बात ही नहीं है।

तुम तो मेरी चौथी राक्षसी पत्नी कैतवी की पुत्री हो, तुम स्वयं संसार के लिये भयंकर हो। तुम व्रजमें जाओ।’ पूतनाने कहा- ‘मेरी बहन वृकोदरी है, मैं उससे मिलकर जाऊँगी, जो होना होगा वह टलेगा नहीं।’ पूतनाने जब अपनी बहनसे स्वप्न की बात बतलायी, तब उसने कहा कि ‘कंसकी बात तुम्हें माननी ही चाहिये। तुम दोनों स्तनों पर विष का लेप कर बालकों को मारती हुई चली आओ।’ तदनन्तर पूतना जैसे ही चली, उसके दाहिने अङ्ग काँपने लगे और वह घबड़ा भी गयी।

फिर भी जाकर श्रीकृष्णके मुखमें अपने स्तनोंको देकर जब दूध पिलाने लगी, तब श्रीकृष्णने उसके प्राणों को ही खींच लिया और वह भयानक रूपमें चिल्लाती हुई गिर पड़ी। पूतना श्रीकृष्णके दर्शन, स्पर्श आदिके प्रभाव से सद्गतिको प्राप्त हो गयी। इसपर नारद जी के द्वारा श्रीकृष्ण से यह पूछे जानेपर कि ‘उसे इतनी उत्तम गति कैसे प्राप्त हुई,’ इसपर उन्होंने कहा-

प्राचीन कालमें सरस्वती नदीके किनारे कक्षीवान् नामक एक मुनि कठिन तपस्या कर रहे थे। एक दिन उनके आश्रम पर काल भीरु नामके एक तपस्वी अपनी स्त्री और अपनी पुत्री चारुमती के साथ आये। कक्षीवान्ने उनका स्वागत किया।

अल्प अवधिमें ही उस कन्या का कक्षीवान्‌ के साथ प्रेम हो गया। कालभीरुने उन दोनों का विवाह कर दिया। जब कालभीरु सपत्नीक वहाँ से चलने लगे, तब उन्होंने प्रार्थना की कि ‘कृपया आप इसका कभी परित्याग न करेंगे।

 कक्षीवान्ने कहा कि यदि यह सद्व्यवहार करती रहेगी तो में इसका परित्याग नहीं करूंगा, किंतु शास्त्रों में पतिद्वेषिणी, कटुभाषिणी, परगृहवासिनी, हीन-जातिरताको त्याज्य बताया गया है। अतः इसे ऐसा न करने का आप उपदेश दें।’ कालभीरू पुत्रीको समझाकर पत्निसहित घर लौट आये।

अपने पिताके चले जानेपर चारुमतीने अपने पतिसे विष्णु भक्ति की प्रशंसा कर सदा उनकी नवधा-भक्ति (उपासना) का विचार किया और दोनोंने प्रतिदिन तुलसी-पत्र, गन्ध, पुष्प, धूप-दीप एवं नित्य हवन आदि से विष्णु भगवान की आराधना आरम्भ कर दी । कक्षीवान् के तीर्थयात्रा चले जानेपर एक दिन चारुमती जब फल-फूल लेकर कुछ विलम्बसे घर आ रही थी, तब उसे मार्गमें एक दुष्ट व्यक्ति मिला। उसने उससे विवाह का प्रस्ताव रखा। चारुमतीने उसे बहुत समझाया, किंतु उसने उलटा समझाकर चारुमतीको भोगोंकी महत्ता बतलायी और उसे अपनी मधुर वाणीसे आकृष्ट कर लिया तथा उसे साथ लेकर चला गया।

उस दुष्टके साथ रहते-रहते चारुमती भी दुष्टा हो गयी। तीर्थयात्रा से लौटनेपर कक्षीवान्ने उसका पता लगाकर उसे अपने साथ लौटानेकी चेष्टा की और उसे उसके पिताकी कही हुई बातका स्मरण कराया, पर वह चारुमती वापस लौटनेको तैयार न हुई, तब उन्होंने उसे राक्षसी हो जानेका शाप दे दिया-

त्वं वञ्चयित्वा मां नूनं यदभूः कितवे रता ।

प्रयातु राक्षस योनिं दुष्टे दुष्टप्रदूषिता ॥

कदाचित् करुणासिन्धुः कृष्णस्संतारयिष्यति ॥

(आदिपुराण )

‘तूने मेरी वञ्चना करके एक धूर्तके साथ प्रेम किया, अतः उस दुष्टके द्वारा दूषित होनेके कारण तू राक्षस योनि को प्राप्त हो। कालान्तरमें करुणासिन्धु भगवान् श्रीकृष्ण तेरा उद्धार करेंगे — तुझे राक्षसी योनिसे छुड़ायेंगे। परिणामस्वरूप वही चारुमती अगले जन्ममें पूतना नामकी राक्षसी हुई और श्रीकृष्ण के द्वारा उसका उद्धार हुआ।

पूतना पूर्व जन्म में कौन थी ?

पूर्व जन्म में पूतना कालभीरु नाम के एक ऋषि की पुत्री थी। जिसका नाम चारुमती था। चारुमती का विवाह कक्षीवान ऋषि से हुआ था।

चारुमती, पूतना कैसे बनी ?

कक्षीवान् के श्राप से चारुमती पूतना बनी

वकासुर की बहन का क्या नाम था ?

वकासुर की बहन का नाम पूतना था।

देश और दुनिया की ताज़ा खबरें सबसे पहले SRDnews पर,  फॉलो करें SRDnews को और डाउनलोड करे – SRDnews की एंड्राइड एप्लिकेशन. फॉलो करें SRD news को फेसबुकट्विटर , गूगल न्यूज़.पर हमारे whatsapp ग्रुप को ज्वाइन करे 

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

%d bloggers like this: