self confidence /क्या आप आख चुराकर बाते करते है /हिम्मत है तो आँख मिलाकर बात करो /self confidence कैसे बडाये

“ हिम्मत है तो आँखे मिलकर बात करो “ – जब कोई यह बात कहता है तो इसका अर्थ यह नहीं की आखे तलवार या बन्दूक बन जाती है !यह कोई रहस्य नही है की यदि कोई व्यक्ति किसी दुसरे से बाते करते हुए आँखे चुराता है तो इसका अर्थ यही की वह कोई बात या तो छुपा रहा है या झूठ बोल रहा है ! सच बोलनेवालो को एसा कोई दर नहीं रहता की आँखे उसके मन का भेद खोल देगी   

          अपराधियों से पूछताछ करते समय पुलिस अफसर यह तरीका अपनाते है ! वह किसी मुजरिम की ठुड्डी के नीचे डंडा रख मुह ऊपर उठा कर सवाल पूछते है तथा उनसे आँखे मिलाकर जवाब देने को कहते है !यह बात अलग है की धाकड़ अपराधी आँखे मिलाकर धड़ल्ले से झूट बोल जाते है !

         बाते करते समय आँखे मिलने ,हुंकार भरने ,सर हिलाने जैसी मुद्राओ पर ध्यान दिया जाता है !अक्सर लोग सोचते है की यदि सामने वाला बाते करते समय उनसे आँखे नहीं मिला रहा है तो इसका मतलब यही की वह या तो उनकी बाते नही सुन रहा है या फिर एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल रहा है !आमतौर पर बाते करते समय लोग 30 से 60 प्रतिशत समय एक दूसरे की आँखों में देखने में लगाते है ,मगर यह 60 प्रतिशत हो जाय तो इसका अर्थ यह निकालना चाहिए की उनकी रूचि वक्ता में अधिक और इसमें कम की वह बोल क्या रहा है !

        और ,अगर दो लोग पलके झपकाय बिना ही लगातार एक दूसरे की आँखों में देखते रहे तो इसके दो मायने हो सकते है ! दोनों प्रेमी –प्रेमिका है या दोनों के बीच घनघोर दुश्मनी है और आँखों – आँखों में दोनों एक दूसरे को तौल रहे है !

        कई लोग सोचते समय या कोई निर्णय करते समय आँखों के सम्पर्क से बचते है ये लोग द्रण निश्चयी नहीं होते इन्हें डर लगता है की यदि उनके निर्णय के प्रति सामने वाले की आँखों में आविस्वास या अनिश्चय नजर आया तो उन्हें भी अपने फैसले का पूरा भरोसा नहीं रह जायगा !
[ top  Secret of success सक्सेस  होने की जबरदस्त टिप्स ]

        द्रण निश्चयी  निर्णय सुनाते समय आँखे नही चुराते ! अपने आत्मविश्वास के कारण ही वे दूसरो की शंकाओं पर अधिक ध्यान नहीं देते

       यह भी पाया गया है की बोलने वाले की तुलना में सुननेवाला आँखों का संपर्क बनाने का इच्छुक ज्यादा होता है !यदि किसी प्रश्न से कोई असहजता महसूस करता है तो वह इधर –उधर देखकर जवाब देता है और  यदि किसी प्रश्न पर वह सुरक्षात्मक या आक्रामक रुख अपनाता है अथवा सीधा जवाब नही देता तो भी उसकी आँखों से नाटकीयता झलकने लगती है और पुतलिया बड़ी हो जाती है! पुतलिया उत्साह में भी बड़ी होती है , पर उनमे एक स्वभाविक उल्लासित चमक होती है !

         लेकिन ,ये बाते हर समय ,हर व्यक्ति पर समान रूप से लागू नहीं होती ! कई लोग शर्मीला होते है और वे इसलिए भी आँखों में देखकर बाते करने से हिचकिचाते है !एसे लोग आँखे मिलकर बात नहीं करने के बावजूद पूरी तरह ईमानदार व सच्चे हो सकते है ,फिर भी जितनी बार वे आँखे चुराकर बाते नहीं करते उतनी बार वे अपने प्रति शक आमंत्रित करते है !

          जासूसों के देखने का ढंग बिलकुल अनूठा होता है !वे  सामनेवालो की आँखों में देखते हुए भी नज़रे चुराय रहते है ! आमतौर पर वे तिरछी से देखते है जिसमे आँखों के टकराव की उम्मीदे बहुत कम रहती है ! उनके इस तरह देखने का कारन यह है की वे देखना तो चाहते है पर देखते हुए भी देखना नहीं चाहते ! उनकी पलके अधमुंदी रहती है जिससे उनकी आँखे सामनेवालो की नजरो से छुप जाती है , पर उनकी नजरो के सामने वो वस्तु या व्यक्ति मौजूद होता है जिस पर उन्हें नजर रखनी होती है !

        प्रेम का इजहार न क्र पानेवाले प्रेमी या प्रेमिका भी इसी तरह देखते है ! आँखों के अलावा भोहे भी हमारे मन का हाल बताने में सक्षम होती है ! भौहे सिकुड़ी हो तो नाराजगी या असमंजस की स्थिति  होती है ; भौहे तनी हो तो ईर्ष्या  या अविश्वास का भाव झलकता है !

        नाक सिकोड़कर अप्रसन्नता या नापसंदगी जाहिर की जा सकती है ! भिचे जबड़े गुस्से या नफरत का इजहार करते है ! तनी हुई ठुड्डी बगावत करती है और भिचे होठ अडियल रुख की चेतावनी देते है तो अगली बार यदि आप किसी से बात करने जाय तो सामनेवाले की मुख्मुद्राय अवस्य ही परख ले !

स्वयं को पहचानिए

मनुष्य की गतिविधियों और उसके शाश्वत अस्तित्व परस्पर कितना आत्मनिर्भर है या कितना पराधीन है ?

       मनोविश्लेसक  स्वयं मनुष्य को ही शक्ति का विराट पुंज मानते है , किसी व्यक्ति विशेस को नहीं ; अर्थात सर्वसाधारण ही असीम शक्ति का केंद्र बिंदु है ! वे मानते है की प्रत्येक व्यक्ति के मानस में एक –सी शक्तिया विद्यमान रहती है ! केवल स्थान काल और परिस्थिति के अनूकूल उनका अलग – अलग विकास होता है ! फिर भी , सर्वसाधारण की समझ में ये बाते नहीं आती ! वह व्यक्ति दूसरो की शक्ति के समक्ष सर झुकाने में सदेव तत्पर रहता है और यह मानने को तैयार नहीं होता की वह स्वयं भी एक सर्वसत्ता – संपन्न इकाई है !

        प्रसिध्द यूनानी दार्शनिक सुकरात ने एक बार एक मंदिर की दीवार पर लिखा था – ‘अपने आपको पहचानो ‘ ! लेकिन ,अपने आपको मनुष्य पहचाने कैसे और पहचाने भी तो क्यों, किसलिए ? अपने आपको पहचान लेने की प्रक्रिया क्या है और इससे लाभ क्या है ?

        मनुष्य जब इन विचारो में धस रहा होता है तब वह निसंदेह पहचानने की प्रक्रिया से गुजर रहा होता है ! अपने आप को पहचानने का अर्थ है ‘ जागरूक होना ‘ अविवेक में मुक्त होते हुए विवेक की शरण में आते जाना ! अविवेक है सघन मूर्छा , और विवेक है प्रकाश ! सघन मूर्छा के जाल को तोड़कर मनुष्य जब प्रकाश में आता है तब असमर्थताय उसके मार्ग की बाधा नहीं बन पाती , बल्कि उसकी अनभिग्य शक्ति का अवलम्ब बन्ने लगती है यो कहा जाय की वे असमर्थताय ही सामर्थ बनकर उसकी शक्ति को बढाती है जिसकी पहचान इंसान को स्वयं की जागरूकता से होती है !

 

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