क्या एक रिटायर्ड जज को गवर्नमेंट की पोस्ट पर अपॉइंट करना चाहिए ?

क्या एक रिटायर्ड जज को गवर्नमेंट की पोस्ट पर अपॉइंट करना चाहिए ?
पिछले साल रिटायर्ड चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई को राज्यसभा में नॉमिनेट किया गया था तब से यह मुद्दा विवाद में चल रहा है कि क्या जजेस को रिटायर होने के बाद उनको कोई सरकारी पद मिलना चाहिए या नहीं? क्या रंजन गोगोई ऐसे एकमात्र जज थे या और कोई जज के साथ भी ऐसा हो चुका है?
पिछले साल मार्च में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रह चुके रंजन गोगोई को उनको राज्यसभा के लिए नॉमिनेट किया गया था जैसे ही नॉमिनेशन कि घोषणा की गई । उसके बाद काफी ज्यादा यह विवाद में रहा । काफी चर्चाएं भी हुई । बहुत सारे सवाल भी उठाए गए.
रंजन गोगोई ऐसे जज थे जिन्होंने कई महत्वपूर्ण फैसलों पर अपना फैसला सुनाया था वह खुद सुप्रीम कोर्ट बेंच में रहे थे ।जैसे अयोध्या राम जन्म भूमि, असम एनआरसी के केस में ,सबरीमाला केस, रफाल केस सभी बेंच में रंजन गोगोई ने एक अहम भूमिका निभाई थी इसलिए सवाल उठाया गया । क्या रंजन गोगोई ने सरकार के द्वारा दिया गया यह फैसला सुनाया ? जिसके कारण उन्हें यह पद मिला? इस तरह की बातें और चर्चाएं शुरू हुई । यह सवाल भी उठाया गया कि एक न्यायपालिका में रहने वाले व्यक्ति को कार्यपालिका में शामिल नहीं होना चाहिए या उनके कार्य में दखल नहीं देना चाहिए। सभी का शक्तियों में बटवारा हमारे संविधान में दिया गया है
सिर्फ रंजन गोगोई ही एकमात्र ऐसे जज नहीं थे । जिन्हें यह पद मिला । रिटायर के बाद पद देने पर रंजन गोगोई पर ही इतनी चर्चाएं इसलिए हुई क्योंकि उन्हें राज्यसभा के लिए नॉमिनेट किया गया और ऐसा बहुत ही कम देखने को मिला है कि किसी रिटायर्ड जज को राज्यसभा की सीट मिली हो।
सन 1999 से 103 सुप्रीम कोर्ट के जज रिटायर हुए हैं और इन 103 रिटायर्ड जजों में से 73 रिटायर्ड जजों को कोई ना कोई पद दिया गया हैं।
आखिर जजों पर ही इतना सवाल क्यों होता है क्योंकि माना जाता है यह एक स्वतंत्र न्यायपालिका है और उन्हें जजों का पद देने के लिए कॉलेजियम सिस्टम है तो आखिर क्यों उनके रिटायर होने के बाद सरकार उन्हें पद देती है।
क्योंकि ऐसा माना जाता है कि एक स्वतंत्र जज जो न्याय देता है उन्हें किसी राजनीतिक पार्टी के साथ ज्यादा मिलजुल कर नहीं रहना चाहिए। क्योंकि इससे यह सवाल उठता है क्योंकि क्या एक स्वतंत्र जज का एकतरफा न्याय तो नहीं है।
हालांकि संविधान में इसके लिए ऐसा कोई कानून नहीं बनाया गया है पर एक सीमित दायरा अनुच्छेद 124(7) में दिया गया है कि कोई जज सुप्रीम कोर्ट का जज किसी और कोर्ट में एडवोकेट या वकील नहीं बन सकता । और अनुच्छेद 220 में भी high court के परमानेंट जज के बारे में सीमित दायरा बनाया गया है।

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